वैश्विक तापन और वैश्विक बर्फ आवरण से जुड़ी हानि से पर्यावरण में बड़े बदलाव आते हैं। जबकि वैश्विक जलवायु प्रणाली और इसकी स्थानिक तथा अस्थायी जटिलता के अंदर क्रायोस्फीयर की कार्यशैली के बारे में हमारा ज्ञान बहुत कम है। क्रायोस्फीयर प्रणाली में वैश्विक जलवायु बदलाव की भूमिका और प्रतिक्रिया को पहचानने के लिए अनिवार्य है कि लंबी अवधि के जलवायु डेटा ज्ञात किए जाएं। उक्त अध्ययन बर्फ की पर्तों से प्राप्त प्रॉक्सी रिकॉर्ड के उपयोग से सबसे अच्छी तरह किए जाते हैं। वास्तव में बर्फ के केन्द्र के अध्ययन पिछले सात सौ से लेकर एक हजार वर्ष के बीच दौरान जलवायु और जैव भूरसायन में मुख्य स्तंभ बन गए हैं। प्रॉक्सी आधारित अध्ययनों से अधिक शुद्ध और बेहतर जलवायु सूचना पाने के लिए अनिवार्य है कि हवा से बर्फ में स्थानांतरण में शामिल जैव भू रसायन प्रक्रियाओं पर पर्याप्त रूप से विस्तृत और मौलिक समझ होनी चाहिए। इसके अलावा भू भौतिकी और हिमनद के अध्ययनों से बर्फ के केन्द्रीय अध्ययनों की मात्रात्मक व्याख्या (विलोमन) करने में मदद मिलेगी।
बर्फ के केन्द्रीय अभिलेख उस असाधारण जानकारी के लिए सर्वोत्तम माने जाते हैं जो वे दीर्घ अवधि समय स्तर – सहस्राब्दि और इससे अधिक समय के लिए जलवायु और जलवायु के प्रबलन के बारे में प्रदान करते हैं। जबकि, एक जलवायु परिवर्तन अनुसंधान करने के लिए प्रमुख आवश्यकता पर्याप्त मात्रा में उच्च विभेदन (कम से कम वार्षिक) आंकड़ों को तैयार करना है जिन्हें जलवायु परिवर्तन के मात्रात्मक अध्ययनों में इस्तेमाल किया जाए और जलवायु प्रबलन के बदलावों का निर्धारण किया जाए। कुछ सर्वाधिक महत्वपूर्ण बर्फ के केन्द्रीय रिकॉर्ड अंटार्कटिका से प्राप्त हुए हैं। जलवायु परिवर्तन की अधिक व्यापक समझ पाने के लिए यह भी आवश्यक है कि अंटार्कटिका के अलावा आर्कटिक क्षेत्र और हिमालय के जलवायु अभिलेख प्राप्त किए जाएं।
(करोड़ रु. में)
| योजना का नाम | 2012-13 | 2013-14 | 2014-15 | 2015-16 | 2016-17 | कुल |
|---|---|---|---|---|---|---|
| क्रायोस्फेयर प्रक्रियाएं और जलवायु परिवर्तन (क्रायो पीएसीसी) | 8 | 7 | 3 | 3 | 2 | 23 |
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Last Updated On 02/17/2015 - 12:54 |