मानसून परिवर्तनीयता

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मानसून अंतर ऋतुकालिक परिवर्तनशीलता (सक्रिय / विराम मानसून अवधि) के विस्तारित रेंज पूर्वानुमान की जांच की जा रही है। यह पाया गया है कि पिछले तीन दशकों के दौरान सक्रिय एवं विराम दोनों अवधियों के संभावित पूर्वानुमान में काफी तेजी से वृद्धि हुई है। मानसून के अंतर-ऋतुकालिक दोलन के उत्तर की ओर प्रसार को संशोधित करने में स्‍तरीय वर्षा की भूमिका का अध्‍ययन किया गया 1951 से 2007 के दौरान भारत के ऊपर दैनिक वर्षा के विश्‍लेषण से उपमहाद्वीप के ऊपर मानसून के प्रारंभ होने की अवधि और आवृति में वृद्धि का पता चलता है। यह नोट किया गया कि मानसून स्‍थिति के प्रारंभ होने की बढ़ती प्रवृति को निरतंर रूप से बड़े पैमाने पर मानसून परिसंचरण तथा ऊर्ध्‍वाधर रूप से एकीकृत नमी परिवहन में आए परिवर्तनों से जोड़ा गया है, निष्‍कर्ष मानसून प्रारंभ होने की बढ़ती प्रवृति के लिए अनुकूल समदर्शी परिवर्तन लाने में उष्‍णदेशीय पूर्वी हिंद महासागर में समुद्र स्‍तर तापमान (एसएसटी) वाष्‍प प्रवृति (0.0150 से) की भूमिका की ओर इंगित करते है।

प्रेक्षणों के विश्‍लेषण के साथ भारतीय मानसून के परिवर्तनों तथा भूमध्‍य हिंद महासागर के ऊपर बने वायुमंडलीय संवहन में आए परिवर्तनों के बीच लिक्‍ंस को समझना परिसंचरण परिवर्तन को सलझाने हेतु काफी महत्‍वपूर्ण है।  जून 2009 के पहले तीन हफ्तों में, खाड़ी के उत्तर की ओर कोई संचरण नहीं था। इसके अलावा, हैड खाड़ी में स्वाभाविक रूप से कोई कम दबाव वाली प्रणाली सृजित नहीं हुई और भारतीय मानसून क्षेत्र में ऐसी प्रणालियों का पश्‍चिम की ओर प्रसार जो मानसून की शुरुआत की विशेषता है, नहीं हुई थी। नतीजतन, जून 2009 में संपूर्ण भारत की वर्षा में (48%) की भारी कमी आई। उन्‍हीं सर्दियों में एल नीनो प्रेरित हिंद महासागर शीत वार्मिंग महत्वपूर्ण है और जो बसंत के साथ-साथ गर्मियों में बनी रहती है।

दूरस्‍थ एल नीनो के दबाव की अपेक्षा पश्चिम में बेसिन पैमाने पर गहरी वार्मिंग स्थानीय आईओडी बल के साथ जुड़ी हुई है। एशिया, अफ्रीका और एनडब्ल्यू प्रशांत क्षेत्र में हिंद महासागर वार्मिंग से प्रेरित जलवायु प्रभाव  देखे जा सकते हैं।

Last Updated On 11/02/2015 - 16:37
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